संपादकीय…
जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता भारत-अमेरिका संबंधों को नई दिशा देने वाली साबित हो सकती है। विश्व राजनीति में तेजी से बदलते समीकरणों के बीच यह मुलाकात केवल औपचारिक कूटनीतिक संवाद नहीं, बल्कि दोनों देशों के रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी हितों को आगे बढ़ाने का अवसर है।
व्यापार और निवेश को बढ़ावा को मिलेगा। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से व्यापारिक बाधाओं को कम करने, भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में अधिक अवसर दिलाने तथा अमेरिकी निवेश को भारत में आकर्षित करने की संभावनाएं मजबूत होती हैं। इससे रोजगार सृजन और आर्थिक विकास को गति मिल सकती है।
भारत और अमेरिका पहले से ही रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण साझेदार हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा तकनीक, हथियार प्रणालियों, संयुक्त सैन्य अभ्यासों और खुफिया सहयोग को और मजबूत करने पर चर्चा भारत की सामरिक क्षमता को बढ़ाने में सहायक हो सकती है। यह विशेष रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता , सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, अंतरिक्ष और डिजिटल प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में अमेरिका अग्रणी है। मोदी-ट्रंप वार्ता से इन क्षेत्रों में सहयोग बढऩे पर भारत को तकनीकी आत्मनिर्भरता और नवाचार क्षमता विकसित करने में मदद मिल सकती है।भारत की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को देखते हुए अमेरिका से तेल, गैस और स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में सहयोग बढ़ सकता है। इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और हरित ऊर्जा संक्रमण को भी गति मिलेगी।वैश्विक मंचों पर समर्थन मिलेगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की भारत की दावेदारी, आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक अभियान तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता जैसे मुद्दों पर अमेरिकी समर्थन भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को और मजबूत कर सकता है।अमेरिका में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग रहते हैं। वीजा, शिक्षा, रोजगार और पेशेवर अवसरों से जुड़े मुद्दों पर सकारात्मक बातचीत भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिए लाभकारी हो सकती है। जी-7 शिखर सम्मेलन में मोदी-ट्रंप द्विपक्षीय वार्ता भारत के लिए आर्थिक, सामरिक, तकनीकी और कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अवसर लेकर आती है। यदि वार्ता में हुई सहमतियों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो इससे भारत की वैश्विक भूमिका और अधिक मजबूत हो सकती है। यह मुलाकात केवल दो नेताओं की बैठक नहीं, बल्कि 21वीं सदी की बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की बढ़ती शक्ति और प्रभाव का संकेत भी है।