युवाओं के मन में पनपता उन्माद कितना खतरनाक?
-चौ0 दलवीर सिंह विद्रोही
गाजियाबाद में 17 वर्षीय सूर्या प्रताप चौहान की हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह समाज के सामने कई असहज और गंभीर प्रश्न खड़े करने वाली घटना है। जिस उम्र में बच्चे सपने बुनते हैं, भविष्य की योजनाएं बनाते हैं और दोस्ती को जीवन का सबसे पवित्र रिश्ता मानते हैं, उस उम्र में एक युवक का अपने परिचितों के हाथों इस तरह मौत के घाट उतार दिया जाना पूरे समाज को झकझोर कर रख देता है।
यदि यह तथ्य सही है कि मृतक और मुख्य आरोपी पहले से एक-दूसरे को जानते थे तथा उनके बीच मित्रवत संबंध थे, तो सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर दोस्ती, परिचय और साथ उठने-बैठने का रिश्ता इतनी भयावह हिंसा में कैसे बदल गया? क्या हमारे युवाओं के भीतर संवाद, सहनशीलता और मतभेदों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने की क्षमता कमजोर पड़ती जा रही है? क्या छोटी-छोटी बातों पर हिंसा का रास्ता चुनना सामान्य होता जा रहा है? अथवा कहीं ऐसा तो नहीं कि समाज में बढ़ रही कट्टरता और वैचारिक उग्रता युवाओं की सोच को प्रभावित कर रही है?
गाजियाबाद की यह घटना इसलिए भी चिंता पैदा करती है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक और सामुदायिक आधार पर अविश्वास की खाई बढ़ती दिखाई दे रही है। सोशल मीडिया, राजनीतिक बयानबाजी, भ्रामक सूचनाएं और कट्टर विचारधाराएं युवाओं के मन-मस्तिष्क को प्रभावित कर रही हैं। जब कोई व्यक्ति अपने भीतर मानवता से अधिक पहचान की कट्टरता को स्थान देता है, तब वह न केवल कानून का अपराधी बनता है, बल्कि सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता के लिए भी चुनौती बन जाता है।पिछले कुछ दशकों में इस्लामी कट्टरपंथ और जिहादी हिंसा अंतरराष्ट्रीय बहस का प्रमुख विषय रहे हैं। आईएसआईएस, अल-कायदा, बोको हराम और तालिबान जैसे संगठनों ने दुनिया भर में हिंसा और आतंकवाद के कारण इस्लामी कट्टरता को वैश्विक चिंता का विषय बनाया है। यह एक ऐसी वास्तविकता है जिससे आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। दुनिया के अनेक देशों में कट्टरपंथी विचारधाराओं ने युवाओं को प्रभावित किया है और मानवता को भारी कीमत चुकानी पड़ी है।हालांकि धार्मिक कट्टरता किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है। इतिहास बताता है कि कट्टरता, उग्र राष्ट्रवाद, नस्लीय श्रेष्ठता, जातीय विद्वेष और राजनीतिक उन्माद भी समाजों को हिंसा की ओर धकेलते रहे हैं। यह देखना होगा कि कट्टरता केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक, जातीय और वैचारिक रूपों में भी सामने आती है। जब कोई व्यक्ति अपने धर्म, जाति, विचारधारा या पहचान को मानवता, कानून और नैतिकता से ऊपर रख देता है, तब कट्टरता जन्म लेती है।
सवाल यह नहीं है कि अपराधी किस धर्म का था। सवाल यह है कि उसके भीतर ऐसी मानसिकता पैदा कैसे हुई, जिसने एक परिचित या मित्र की जान लेने से पहले उसे रोकने का काम नहीं किया। किसी भी धर्म, मजहब या विचारधारा का मूल संदेश निर्दोष की हत्या नहीं हो सकता। लेकिन जब कट्टरता, वैचारिक नफरत और असहिष्णुता लोगों पर हावी हो जाती है, तब व्यक्ति अपने धर्म की नहीं बल्कि अपनी विकृत मानसिकता की पहचान प्रस्तुत करता है। दुर्भाग्य यह है कि ऐसे कृत्यों का दुष्प्रभाव पूरे समुदाय पर पड़ता है और समाज में अविश्वास बढ़ता है।
निस्संदेह किसी एक व्यक्ति या समूह के अपराध के आधार पर पूरे समुदाय को कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि समाज उन कारणों की ईमानदारी से पड़ताल करे, जो युवाओं के भीतर कट्टरता, हिंसा और सामाजिक ध्रुवीकरण को जन्म दे रहे हैं। जातीय श्रेष्ठता, धार्मिक उन्माद, पहचान की राजनीति और नफरत की संस्कृति कहीं हमारी नई पीढ़ी को गलत दिशा में तो नहीं ले जा रही? यह प्रश्न आज हर समाज, हर परिवार और हर नेतृत्व के सामने खड़ा है।सूर्या की हत्या का न्याय अदालत देगी और अपराधियों को सजा कानून देगा। लेकिन इस घटना का सबसे बड़ा सबक समाज को लेना होगा। यदि हम अपने बच्चों को मानवीय मूल्यों, सहिष्णुता, संवेदनशीलता और भाईचारे के बजाय केवल पहचान की राजनीति और वैचारिक विभाजन सिखाएंगे, तो ऐसी घटनाएं बार-बार हमारे सामने खड़ी होंगी।
आज आवश्यकता केवल अपराधियों को दंडित करने की नहीं, बल्कि उन विचारों और परिस्थितियों की पहचान करने की भी है जो युवाओं को हिंसा की ओर धकेल रही हैं। क्योंकि जब दोस्ती के चेहरे पर खून के छींटे पड़ने लगें, तब समझ लेना चाहिए कि खतरा केवल एक परिवार पर नहीं, एक समाज विशेष पर नहीं बल्कि धर्म पर मंडरा रहा है।

लेखक-श्रीजी एक्सप्रेस के वरिष्ठ पत्रकार व सामाजिक ,राजनीतिक विश्लेषक ,चिंतक हैं
