डॉ दीपक गोस्वामी
रणभूमि मौन थी। धूल उड़ रही थी। आकाश रक्तिम था। उस रक्तिम आकाश के नीचे रावण गिरा पड़ा था। रथ चूर हो चुका था। कवच के टुकड़े बिखर गए थे। हाथ से शस्त्र छूट गया था। दसों मुकुट धूल में सने थे। सामने धनुष पर बाण चढ़ाए राम खड़े थे। एक पल को लगा कि अब रामायण समाप्त हुई। बस एक बाण और रावण का अंत। युगों का कलंक मिट जाएगा। सीता का दुख समाप्त होगा। वानर सेना जयकार कर उठेगी। पर राम ने बाण नहीं छोड़ा। उन्होंने धनुष को धीरे से नीचे किया। प्रत्यंचा ढीली हुई। और फिर जो शब्द उनके मुख से निकले, वे शब्द नहीं थे। वे युगों का धर्म थे। वे भारत का संविधान थे। वे मानवता की आत्मा थे। राम बोले। जा रावण। आज तू थका हुआ है। तू निहत्था है। तेरे पास न रथ है न कवच है न शस्त्र है। मैं निहत्थे पर वार नहीं करता। यह रघुकुल की रीति नहीं है। यह आर्य संस्कृति नहीं है। यह युद्ध का धर्म नहीं है। तू विश्राम कर। अपनी लंका जा। रात भर सो। घावों पर औषधि लगा। कल प्रात: सूर्य के साथ आ। नए रथ पर बैठकर आ। नया कवच पहनकर आ। नया शस्त्र लेकर आ। अपनी पूरी शक्ति, अपना पूरा बल, अपना पूरा अहंकार लेकर आ। तब हम युद्ध करेंगे। तब मैं तुझे देखूंगा। तब धर्म और अधर्म का निर्णय होगा।
यह संवाद केवल दो योद्धाओं का नहीं था। यह दो विचारधाराओं का टकराव था। एक ओर राम खड़े थे। मर्यादा पुरुषोत्तम। जिन्होंने पिता के एक वचन के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया। जिन्होंने अयोध्या का सिंहासन ठुकराकर तपस्वी का जीवन चुना। जिन्होंने केवट को मित्र कहा। शबरी के जूठे बेर खाए। सुग्रीव को गले लगाया। विभीषण को शरण दी। जो समुद्र से भी विनती करते हैं कि मार्ग दो, और जब नहीं मिलता तब ही बाण उठाते हैं। जिनके लिए राज्य से बड़ा धर्म था। सुख से बड़ा सत्य था। सत्ता से बड़ा वचन था। उनका बल उनकी भुजाओं में नहीं था। उनका बल उनके धैर्य में था। उनके त्याग में था। उनकी करुणा में था। उनकी मर्यादा में था।
दूसरी ओर रावण था। कौन था रावण। महापंडित। चारों वेदों का ज्ञाता। ज्योतिष का आचार्य। आयुर्वेद का विद्वान। राजनीति का मर्मज्ञ। संगीत का सृजनकर्ता। शिव तांडव स्तोत्र का रचयिता। जिसने अपने तप से शिव को प्रसन्न किया। जिसने अपने बल से नवग्रहों को बंदी बनाया। जिसने सोने की लंका का निर्माण किया। जहाँ प्रजा सुखी थी। जहाँ विज्ञान उन्नत था। जहाँ पुष्पक विमान उड़ता था। जहाँ धन की वर्षा होती थी। वह मूर्ख नहीं था। वह अज्ञानी नहीं था। वह कायर नहीं था। वह पराक्रमी था। वह प्रतापी था। वह तेजस्वी था। पर उसके पास एक वस्तु नहीं थी। वह थी मर्यादा। उसने शक्ति को सत्ता समझ लिया। उसने ज्ञान को अहंकार बना दिया। उसने तप को वरदान समझा, उत्तरदायित्व नहीं। उसने सोचा कि मैं जो चाहूँ कर सकता हूँ। मुझे कौन रोक सकता है। इसी अहंकार ने उसे सीता हरण तक पहुँचा दिया। पराई स्त्री पर दृष्टि डालना ही उसका पतन बन गया। क्योंकि जहाँ स्त्री का सम्मान नहीं, वहाँ धर्म नहीं टिकता। और जहाँ धर्म नहीं, वहाँ सोने की लंका भी एक दिन राख हो जाती है।

अब प्रश्न यह है कि नायक कौन है। समाज आज भी भ्रमित है। आज भी लोग कहते हैं कि रावण महान था। हाँ, वह महान था। पर नायक नहीं था। नायक और महान में अंतर है। रावण महान योद्धा था, पर नायक राम हैं। रावण महान ज्ञानी था, पर नायक राम हैं। रावण महान शिवभक्त था, पर नायक राम हैं। क्यों। क्योंकि नायक वह नहीं होता जिसके पास शक्ति हो। नायक वह होता है जो शक्ति का उपयोग धर्म के लिए करे। नायक वह नहीं जिसके पास ज्ञान हो। नायक वह है जो ज्ञान को विनम्रता से धारण करे। नायक वह नहीं जो जीत जाए। नायक वह है जो जीतकर भी धर्म न छोड़े।
इस कथा का संदेश आज के लिए क्या है। सुनो। सामाजिक न्याय का अर्थ है कि निर्बल को कुचलकर कोई बड़ा न बने। जिस समाज में रावण जैसे बलशाली सीता जैसी निर्बल स्त्री का हरण कर लें, वह समाज सड़ जाता है। आर्थिक नीति का अर्थ है कि त्याग से समृद्धि जन्मे, शोषण से नहीं। रावण की लंका सोने की थी, पर वह सोना दूसरों को लूटकर आया था। इसलिए वह टिक नहीं पाया। राम का राज्य वनवास से निकला था, त्याग से निकला था, इसलिए वह अमर हो गया। राजनीति का अर्थ है कि विरोधी को भी जीने का अधिकार मिले। राम ने रावण को भी कल आने का अवसर दिया। आज की राजनीति में विरोधी को समाप्त करने की होड़ है, सम्मान देने की नहीं। कूटनीति का अर्थ है कि युद्ध अंतिम विकल्प हो, पहला नहीं। राम ने पहले अंगद को दूत बनाकर भेजा। समझाया। चेताया। जब सब मार्ग बंद हो गए, तब ही युद्ध किया। और युद्ध में भी धर्म छोड़ा नहीं।विश्व कल्याण का मार्ग भी यही है। आज विश्व बारूद के ढेर पर बैठा है। हर राष्ट्र रावण बनना चाहता है। सबके पास शक्ति है। सबके पास ज्ञान है। सबके पास तकनीक है। पर मर्यादा किसी के पास नहीं। कोई दूसरे की भूमि हड़पना चाहता है। कोई दूसरे की संस्कृति मिटाना चाहता है। कोई अपने अहंकार में पर्यावरण को निगल रहा है। ऐसे में राम का संदेश ही बचाव है। धर्मो रक्षति रक्षित:। जो राष्ट्र धर्म की रक्षा करेगा, धर्म उस राष्ट्र की रक्षा करेगा। धर्म का अर्थ यहाँ मजहब नहीं है। धर्म का अर्थ है कर्तव्य। प्रकृति के प्रति कर्तव्य। निर्बल के प्रति कर्तव्य। भविष्य की पीढ़ी के प्रति कर्तव्य। सत्य के प्रति कर्तव्य।इसलिए याद रखो। इतिहास बलशालियों को याद नहीं रखता। इतिहास धर्मशीलों को पूजता है। सिकंदर आया और चला गया। चंगेज खान आया और मिट गया। हिटलर आया और राख हो गया। पर राम आज भी जीवित हैं। क्यों। क्योंकि तलवारें टूट जाती हैं। सिंहासन डोल जाते हैं। साम्राज्य बिखर जाते हैं। पर मर्यादा अमर रहती है। चरित्र अमर रहता है। त्याग अमर रहता है।अत: हे भारत। हे युवा। हे विश्व के नागरिक। रावण बनना सरल है। बुद्धि चाहिए, शक्ति चाहिए, अहंकार चाहिए। पर राम बनना कठिन है। उसके लिए धैर्य चाहिए। त्याग चाहिए। करुणा चाहिए। मर्यादा चाहिए। वही राष्ट्र महान बनेगा जो रावण जैसी बुद्धि, रावण जैसा ज्ञान, रावण जैसा विज्ञान रखे, पर राम जैसा चरित्र चुने। रावण का मस्तिष्क और राम का हृदय, जब ये दोनों मिलते हैं, तभी रामराज्य आता है।यही रामायण का सार है। यही गीता का निचोड़ है। यही वेदों की पुकार है। व्यक्ति के उत्थान के लिए। परिवार के निर्माण के लिए। समाज के कल्याण के लिए। राष्ट्र की रक्षा के लिए। और सम्पूर्ण विश्व में शांति, समृद्धि और धर्म की स्थापना के लिए। उठो। जागो। राम बनो। क्योंकि युग बदलते हैं, पर धर्म नहीं बदलता। और धर्म ही अंतिम विजय है

लेखक व्यवहार वैज्ञानिक, मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर, सामाजिक कार्यकर्ता है .