सौरभ वाष्र्णेय
फ्रांस के एवियान में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन 2026 में भारत की भागीदारी केवल एक आमंत्रित देश के रूप में उपस्थिति भर नहीं है, बल्कि यह भारत की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता और प्रभाव का प्रमाण है। लगातार कई वर्षों से जी-7 देशों द्वारा भारत को आमंत्रित किया जाना इस बात का संकेत है कि विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं अब वैश्विक चुनौतियों के समाधान में भारत की भूमिका को अनिवार्य मानने लगी हैं। विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। यद्यपि भारत जी-7 का सदस्य नहीं है, फिर भी उसे विशेष आमंत्रित देश के रूप में लगातार बुलाया जाना इस बात का संकेत है कि वैश्विक चुनौतियों के समाधान में भारत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

बैठक से भारत की बढ़ती कूटनीतिक प्रतिष्ठा भी बढ़ रही है। जी-7 विश्व की सात प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। भारत इसका सदस्य नहीं है, फिर भी उसे लगातार आमंत्रित किया जाता रहा है। इसका प्रमुख कारण भारत की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, विशाल बाजार, रणनीतिक स्थिति और वैश्विक दक्षिण के प्रतिनिधि के रूप में उसकी मजबूत पहचान है।प्रधानमंत्री ने सम्मेलन के दौरान अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, जापान, दक्षिण कोरिया, मिस्र, केन्या और अन्य देशों के नेताओं से द्विपक्षीय वार्ताएं कीं। इससे भारत के राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को नई मजबूती मिलने की संभावना है।जी-7 सम्मेलन में वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विषय प्रमुख रहे। भारत के लिए यह मंच विदेशी निवेश आकर्षित करने, तकनीकी सहयोग बढ़ाने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी भागीदारी मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है। अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक मुद्दों पर हुई चर्चा भविष्य में व्यापक आर्थिक समझौतों का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।इस वर्ष जी-7 में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग पर विशेष चर्चा हुई। भारत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, डिजिटल भुगतान और एआई नवाचार के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में विकसित देशों के साथ सहयोग भारत को तकनीकी नेतृत्व की दिशा में और आगे ले जा सकता है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में विकासशील देशों की समस्याओं—ऋण संकट, जलवायु वित्त, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा—को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रभावी ढंग से उठाया है। जी-7 में भारत की मौजूदगी इन मुद्दों को प्रमुख शक्तियों के सामने रखने का अवसर देती है। इससे भारत एक सेतु की भूमिका निभाता है जो विकसित और विकासशील देशों के बीच संवाद को मजबूत करता है। यूक्रेन संकट, पश्चिम एशिया की स्थिति, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति जैसे विषयों पर भारत की राय को गंभीरता से सुना जा रहा है। इससे भारत की सामरिक विश्वसनीयता बढ़ी है। अमेरिका सहित कई प्रमुख देशों द्वारा भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण साझेदार माना जा रहा है।
जी-7 शिखर सम्मेलन 2026 भारत के लिए केवल कूटनीतिक उपस्थिति का अवसर नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आर्थिक सहयोग, तकनीकी साझेदारी, निवेश, सुरक्षा और वैश्विक दक्षिण के हितों की पैरवी—इन सभी क्षेत्रों में भारत ने अपनी उपयोगिता सिद्ध की है। यह सम्मेलन स्पष्ट संकेत देता है कि 21वीं सदी की विश्व व्यवस्था में भारत अब केवल एक उभरती शक्ति नहीं, बल्कि नीति निर्माण और वैश्विक निर्णयों को प्रभावित करने वाला प्रमुख खिलाड़ी बनता जा रहा है।
जी-7 शिखर सम्मेलन में मोदी-ट्रंप द्विपक्षीय वार्ता के मायने
जी-7 शिखर सम्मेलन 2026 के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता ने एक बार फिर भारत-अमेरिका संबंधों को वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ऐसे समय में जब विश्व भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी नई चुनौतियों से जूझ रहा है, तब दुनिया के दो बड़े लोकतांत्रिक देशों के नेताओं की यह मुलाकात विशेष महत्व रखती है। इस वार्ता में व्यापार समझौते, रक्षा सहयोग, प्रौद्योगिकी, निवेश, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, समुद्री सुरक्षा तथा वैश्विक रणनीतिक साझेदारी जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
भारत और अमेरिका के संबंध पिछले एक दशक में अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं। दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता, आतंकवाद के विरुद्ध सहयोग और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित बनाने के साझा उद्देश्य रखते हैं। जी-7 सम्मेलन के दौरान हुई इस वार्ता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष संभावित द्विपक्षीय व्यापार समझौता रहा। दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है, लेकिन शुल्क, बाजार पहुंच और तकनीकी नियमों को लेकर मतभेद भी बने हुए हैं। ऐसे में वार्ता से यह संकेत मिला है कि दोनों पक्ष आर्थिक सहयोग को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के इच्छुक हैं।
रक्षा क्षेत्र में भी यह बैठक महत्वपूर्ण रही। राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों को मजबूत बताते हुए भारत की सुरक्षा के प्रति समर्थन व्यक्त किया। यह बयान ऐसे समय आया है जब एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और भारत अपनी सुरक्षा क्षमताओं को और सुदृढ़ करने में जुटा है।
समुद्री सुरक्षा का मुद्दा भी चर्चा का केंद्र रहा। प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक समुद्री मार्गों की सुरक्षा और भारतीय नाविकों की सुरक्षा का विषय उठाया। भारत विश्व व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए सुरक्षित समुद्री मार्गों को अत्यंत महत्वपूर्ण मानता है। यह पहल भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता और मुक्त नौवहन को बढ़ावा देना चाहता है।
हालाँकि, केवल सकारात्मक पक्षों को देखना पर्याप्त नहीं होगा। भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक हितों में कई बार टकराव भी सामने आते रहे हैं। अमेरिका अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं के अनुरूप कठोर व्यापारिक रुख अपनाता है, जबकि भारत अपने घरेलू उद्योगों और कृषि क्षेत्र के हितों की रक्षा करना चाहता है। इसलिए किसी भी समझौते को संतुलित और पारस्परिक हितों पर आधारित होना चाहिए।
कुल मिलाकर, जी-7 सम्मेलन में मोदी-ट्रंप वार्ता भारत-अमेरिका संबंधों को नई दिशा देने वाली महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकती है। यदि दोनों देश व्यापार, प्रौद्योगिकी, रक्षा और वैश्विक सुरक्षा के क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग को आगे बढ़ाते हैं, तो इसका लाभ केवल दोनों देशों को ही नहीं बल्कि वैश्विक स्थिरता को भी मिलेगा। भारत के लिए यह अवसर है कि वह अपनी बढ़ती आर्थिक और सामरिक शक्ति के अनुरूप वैश्विक मंचों पर और प्रभावशाली भूमिका निभाए।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।
