संजय शर्मा
आजादी के बाद जो बीते 75 साल में नहीं हुआ वो मोदी राज में हो रहा है। 75 साल में देश की न्यायपालिका की जो गत आज हो रही है वह पहले कभी नहीं। कहीं भरी अदालत में जज से अभद्रतापूर्ण व्यवहार किया जा रहा जो कहीं किसी राजनीतिक दल का नेता भरी अदालत में जज को उसके पूर्व कृत्यों को लेकर आईना दिख रहा है।
इस सबसे आगे बढ़ कर देश के इतिहास में पहली बार किसी जज को प्रेस के सामने आकर कहना पड़ रहा है कि मीडिया ने उसके ब्यान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया है। आखिर इस सब के पीछे क्या कारण क्या देश की न्यायपालिका उस दौर से गुजर रही है जब उसके सामने मान सम्मान और प्रतिष्ठा को लेकर बड़े सवाल खड़े हो रहे है। इस सवालों के पीछे आखिर कौन जिम्मेदार है। क्या इस ठिकरा मौजूद मोदी सरकार के सिर फोड़ा जा सकता है। या फिर इसके लिए स्वयं न्यायपालिका जिम्मेदार लेनी चाहिए है।
2014 के लोकसभा चुनाव और मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल के बाद से देश की न्यायपालिका के चाल चरित्र और चेहरे में बदलाव शुरू हो गया था। वर्तमान समय में बात गोदी मीडिया की हो या फिर चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवालों की…। हर एक प्रकरण की अंतिम कड़ी में न्यायपालिका ही नजर आती है। हालांकि न्यायपालिका पर 2014 से पहले भी सवाल उठते रहे है, लेकिन मौजूद दौर में सवालों का प्रारूप और उसके तेवर बदल गए है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यदि कोई है तो वो सरकार है… जिसमे देश की अफसरशाही से लेकर मीडिया तक को अपनी कुर्सी के नीचे दबा कर रखा हुआ है।
बीते एक दशक में न्यायपालिका बहुत से ऐसे निर्णय दिए जिसका सीधा लाभ केंद्र की सरकार और भारतीय जनता पार्टी को हुआ। नोट बंदी, तीन तलाक, जम्मू कश्मीर में धारा 370, अयोध्या राम मंदिर, अंबानी के वन तारा, वोडा फोन, ईवीएम, दिल्ली सरकार के प्रशासनिक अधिकार को लेकर दायर याचिकाओं, मथुरा मंदिर मामला समेत ऐसे बहुत से मामले है जिसमें न्यायपालिका ने भाजपा को संरक्षण देने का काम किया। इतना ही नहीं सेवानिवृत होने के बाद जजों ने सार्वजनिक मंच पर कुछ ऐसे ब्यान दिए जिनसे पूर्व के निर्णयों को लेकर आम जन के मन सवाल उठने लगे।
इनमे मुख्य रूप से जज डीवाई चंद्रचूड़ ने अक्टूबर 2024 में अपने पैतृक गाँव में दिए एक भाषण में यह साझा किया था कि वे तीन महीने तक चले अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के फैसले के दौरान काफी तनाव में थे और उन्होंने समाधान पाने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की थी। इलेक्टोरल बांड योजना के फ़ैसले को यदि अपवाद के रूप में छोड़ दें तो सरकार के खिलाफ दायर अधिकांश मामलों में अदालतों के निर्णय सत्ता के पक्ष में रहे। हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन के कार्यकाल के दौरान सु्प्रीम कोर्ट के जज ने भी मेडिकल कालेज लॉबी को लाभांिवत करने के लिए आदेश दिया था।
यह कोई नही वाक्या नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य जज सूर्यकांत ने अदालत में इस तरह की टिप्पणी की हो। बीते 6 महिने की अगर बात करें तो जज सूर्यकांत ने करीब 6 ज्यादा बार इसी तरह के बयान अदालत में दिए। 15 मई 2026 को बेरोजगारों को कॉकरोच बताया। 11 मई 2026 को पर्यावरण से मामले में पर्यावरण विदों के खिलाफ एक बयान दिया। 29 जनवरी 2026 को ट्रेड युनियन के मामले में बयान देकर कहा कि उनकी वजह से औद्योगिक विकास नहीं हो रहा है। यह लोग देश के विकास में बाधक है। 2 दिसंबर 2025 को रोहिंग्या के मामले में एक बयान दिया। 12 दिसंबर 2025 को रोहिंग्या के बयान पर सफाई दी और कि मुझे कोई डरा नहीं सकाता। 03 मार्च 2025 को फ्रीडम ऑफ स्पीच के मामले में बयान दिया। मई 2025 प्रोफेसर महमूदाबाद के मामले में कहा कि हम जानते है कि इन्हे कैसे हैंडल करना है। इससे पहले वर्ष 2022 में नूपुर शर्मा के मामले में एक बयान दिया था।
वर्तमान में सिस्टम से सवाल करने वालों को कुचलने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए देश के संविधान में वर्णित तीनों स्तंभ कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका एकजुटता के साथ देश के आम नागरिक की आवाज और उनके अधिकारों को दबाने के लिए काम कर रहा है। आज देशभर के समाजसेवी, पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ता, आरटीआई कार्यकर्ता, सोशल मीडिया, मीडिया कर्मी, और बेरोजगारों से जुड़े मामले को उठाने वाले लोगों के मन में सवाल है कि उठता है कि क्या उन्हें जज सूर्यकांत के नेतृत्व वाली पीठ में न्याय मिलेगा।
ऐसे में जरूरत है कि जज सूर्यकांत आम जन के सरोकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लेना चाहिए। यदि जज सूर्यकांत ऐसे मामलों से स्वयं को अलग से करने से इंकार करते है कि तो याचिकाकर्ताओं और उनके वकीलों को अदालत का बहिष्कार करने के विकल्प पर विचार करना चाहिए। साथ जजों का भी चाहिए कि वह संवैधानिक पद पठ कर संबंधित मामलों से इतर प्रवचन देने से बचे। न्यायपालिका को सत्ता की चाटुकारिता का तैयाग कर गिरती साख को बचाने में के उपाय पर काम करना हेगा। ऐसे उपाए और निर्णय देने होंगे जिसे आमजन के मन में न्यायपालिका और जजों के प्रति विश्वास पैदा हो सके। अन्यथा न्यायपालिका और जजों को आमजन के गुस्से का सामना करने को तैयार रहना पड़ेगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार व एनसीआरटुडे समाचार पत्र से जुड़े हैं।