विदेशी स्वदेशी पीढ़ी के नाम : हिंदू धर्म
विवेक रंजन श्रीवास्तव
विदेश में रहते हुए अपनी संस्कृति और धर्म को एक नए दृष्टिकोण से देखने समझने का अवसर मिलता है। भारत में जिन धार्मिक परंपराओं को हम बचपन से देखते-सुनते आए हैं, उनके पीछे छिपे दर्शन, देव-परंपरा, कथाओं और पर्वों की समझ हममें बिना अलग प्रयत्न के देखते सुनते विकसित हो जाती है।
पर विशेष रूप से विदेश में रहने वाली भारतीय पीढ़ी और उनके बच्चों के मन में यह जिज्ञासा रहती है कि हमारे इतने सारे भगवान कौन हैं? ब्रह्मा, विष्णु और महेश का आपस में क्या संबंध है? राम और कृष्ण अवतार कैसे हैं?
गणेश, शिव, दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा कब और क्यों की जाती है? वर्ष भर आने वाली जयंतियों और त्योहारों का धार्मिक अर्थ क्या है?
मुझसे यहां मेरे अनेक परिचितों ने यह चाहा कि मैं भारतीय सनातन धर्म की देव-परंपरा को समझाने के लिए लिखूं।
इसलिए यह विस्तृत लेख अपनी अल्प जानकारी के अनुसार प्रस्तुत कर रहा हूं।
आशा है विदेशों में जन्मी पल रही पीढ़ी जिन्हें भारतीय धार्मिकता में अभिरुचि है, को किंचित तथ्यात्मक समाधान मिल सकेगा ।
हम भारतीय धार्मिक वैभिन्य को एक विशाल वृक्ष के रूप में समझ सकते हैं।
इसकी जड़ें वेदों और उपनिषदों के आध्यात्मिक चिंतन में हैं।
तना धर्म, दर्शन और उपासना की विकसित परंपराओं का है।
इसकी शाखाओं में वैष्णव, शैव, शाक्त, सौर, गाणपत्य और अन्य धार्मिक धाराएँ दिखाई देती हैं।
इसकी पत्तियों और फूलों की तरह असंख्य क्षेत्रीय देवी-देवता, लोकाचार, व्रत, उत्सव और पारिवारिक परंपराएँ हैं।
(उपरोक्त उदाहरण केवल समझने के लिए प्रस्तुत कर रहा हूं , यह कोई शास्त्रीय ईश्वरीय वंशावली नहीं है।)
ब्रह्म / परम सत्य
वैदिक और पौराणिक देव-परंपराएँ
भगवान ब्रह्मा-सृष्टि निर्माता देव के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
भगवान विष्णु-सृष्टि के पालन कर्ता ईश्वर माने गए हैं।
भगवान शिव-भगवान शंकर अर्थात शिव को सृष्टि के संहार और रूपांतरण के परमात्मा स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है।
हिंदू धर्म में विविध उपासना-परंपराएँ
देवी-शक्ति , विष्णु के अवतार , शिव परिवार , सूर्य , गणेश , लोकदेवता
यह सरल रूपरेखा है। विभिन्न हिंदू संप्रदाय पूजन पाठ में देवताओं को अपनी श्रद्धा के अनुसार स्वतंत्र रूप में मानते हैं।
हिंदू पूजन उपासना पद्धति में इतना अधिक लचीलापन तथा समावेशी भाव है कि प्रत्येक को आराधना के दिन , समय , तरीके , अवधि आदि की कोई बाध्यता अन्य धर्मों की भांति नहीं है।
व्यक्ति को स्वयं अपनी आंतरिक शक्तियों को ध्यान से साध कर ईश्वरीय शक्ति से तादात्म्य स्थापित करने की साधना ही हिंदू पूजन उपासना पद्धति है।
वेदों से पुराणों तक : हमारे धार्मिक ज्ञान के प्राचीन स्रोत –
सनातन धर्म का धार्मिक साहित्य एक विशाल परंपरा है। इसमें विभिन्न कालों में ऋषि मुनियों तपस्वियों द्वारा रचित अनेक ग्रंथ हैं और उनकी भूमिका भी अलग-अलग है।
वेद —
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। इनमें मंत्र, यज्ञ, देवताओं की स्तुतियाँ और वैदिक धार्मिक चिंतन मिलता है। इंद्र, अग्नि, सोम, सूर्य, उषा और वरुण जैसे देवताओं का महत्वपूर्ण उल्लेख वैदिक साहित्य में है।
उपनिषद —
वेदांत के दार्शनिक आधार से जुड़े ग्रंथ। इनमें ब्रह्म, आत्मा, ज्ञान, कर्म और मोक्ष जैसे प्रश्नों पर गहन विचार मिलता है। ईश, केन, कठ, मुण्डक, माण्डूक्य और बृहदारण्यक जैसे उपनिषद विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
रामायण —
महर्षि वाल्मीकि से संबद्ध संस्कृत महाकाव्य, जिसमें राम के जीवन, वनवास, सीता, लक्ष्मण, हनुमान और रावण की कथा है। राम को विष्णु के अवतार के रूप में समझने की परंपरा विशेष रूप से विकसित हुई है।
गोस्वामी तुलसीदास ने इसे रामचरित मानस के रूप में प्रस्तुत किया जो सर्वाधिक लोकप्रिय हिंदू धार्मिक ग्रंथ है।
महाभारत —
एक विशाल संस्कृत महाकाव्य, जिसमें कुरुक्षेत्र का युद्ध, धर्मसंकट, राजवंश, जीवन-मूल्य और अनेक धार्मिक आख्यान हैं। इसी के भीष्म पर्व में भगवद्गीता का संवाद आता है।
भगवद्गीता —
श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद। इसमें कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, आत्मा, धर्म और मोक्ष पर उपदेश दिए गए हैं। यह महाभारत का हिस्सा है।
पुराण —
सृष्टि, देवताओं, वंशावलियों, तीर्थों, धार्मिक आख्यानों और उपासना की परंपराओं का विस्तृत साहित्य। विष्णु पुराण, भागवत पुराण, शिव पुराण, मार्कण्डेय पुराण और देवी भागवत जैसे ग्रंथ विभिन्न धार्मिक धाराओं में महत्वपूर्ण हैं। ( जो भगवान सत्य नारायण की कथा प्रायः पूजा के रूप में कही जाती है वह भी पुराण से ही लिया गया छोटा सा हिस्सा है। )
यह भी समझना आवश्यक है कि पुराणों में वर्णित कथाएँ सभी एक ही समय में नहीं लिखी गईं। वे दीर्घकाल में विकसित और संकलित हुईं। इसलिए किसी कथा के अलग-अलग संस्करण मिलना बहुत स्वाभाविक है।
प्रमुख देवताओं का परिचय और संबंधित ग्रंथ
1\. भगवान ब्रह्मा : सृष्टि के रचयिता
भगवान ब्रह्मा को हिंदू पौराणिक परंपरा में सृष्टि के रचयिता के रूप में जाना जाता है। उनकी चार मुख वाली छवि चार वेदों और चार दिशाओं के रूप में समझाई जाती है। कमल, वेद और कमंडलु उनके सामान्य प्रतीकों में शामिल हैं।
पुराणों में ब्रह्मा की उत्पत्ति और सृष्टि-रचना के अलग-अलग आख्यान मिलते हैं। विष्णु पुराण और भागवत पुराण में सृष्टि-वर्णन के प्रसंगों में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। कुछ कथाओं में वे विष्णु की नाभि से निकले कमल पर प्रकट होते हैं।
सरस्वती को ज्ञान और वाणी की देवी के रूप में जाना जाता है। उन्हें ब्रह्मा की सहधर्मचारिणी कहने की पौराणिक परंपरा भी मिलती है, हालांकि विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में देवी की स्वतंत्र महत्ता भी स्पष्ट है।
ब्रह्मा की पूजा अन्य देवताओं की तुलना में कम व्यापक दिखाई देती है, लेकिन पुष्कर, राजस्थान का ब्रह्मा मंदिर विशेष प्रसिद्ध है।
2\. भगवान विष्णु : पालनकर्ता और अवतारों की परंपरा
विष्णु भगवान हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में हैं। पौराणिक परंपरा में उन्हें जगत के पालनकर्ता के रूप में जाना जाता है। वे शेषनाग पर क्षीरसागर में शयन करते हुए चित्रित किए जाते हैं। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल होते हैं।
विष्णु भगवान से संबंधित प्रमुख ग्रंथों में विष्णु पुराण, भागवत पुराण और महाभारत के अनेक प्रसंग शामिल हैं। वैष्णव संप्रदायों में विष्णु या नारायण को सर्वोच्च ईश्वर माना जाता है।
विष्णु की परंपरा की विशेषता है अवतारवाद। जब धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश की आवश्यकता होती है, तब ईश्वर के अवतरण की अवधारणा सामने आती है। भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
यह श्लोक धर्म की स्थापना के लिए भगवान के अलग अलग रूप में दिव्य अवतरण की अवधारणा को समझाता है।
3\. भगवान शिव : महादेव, योगी और संहार से परे सृष्टि का रूपांतरण
शिव भगवान को महादेव, शंकर, नीलकंठ, पशुपति और कई अन्य नामों से पूजा जाता है। वे योग, तप, वैराग्य, करुणा और आध्यात्मिक मुक्ति से जुड़े हैं। उनका तांडव सृष्टि के परिवर्तनशील स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।
शिव से संबंधित प्रमुख ग्रंथों में शिव पुराण, लिंग पुराण, स्कंद पुराण के कुछ खंड और शैव आगम परंपराएँ महत्वपूर्ण हैं। वैदिक साहित्य में रुद्र का उल्लेख मिलता है, जो बाद की धार्मिक परंपराओं में शिव के साथ संबद्ध हुआ।
शिवलिंग शिव की उपासना का प्रमुख प्रतीक है। यह केवल एक मूर्ति-रूप नहीं, बल्कि विभिन्न धार्मिक व्याख्याओं में शिवतत्त्व, सृजनात्मक शक्ति और अनंत सत्ता से संबंधित प्रतीक के रूप में समझा जाता है।
शिव परिवार की लोकप्रिय परंपरा में देवी पार्वती को भगवान शिव की पत्नी , गणेश और कार्तिकेय को उनके पुत्र का विशेष स्थान मिला है।
नंदी शिव के वाहन और भक्त के रूप में पूजित हैं।
4\. देवी शक्ति : दुर्गा, पार्वती और देवी मां के अनेक रूप
हिंदू धर्म में देवी की उपासना स्वतंत्र और अत्यंत व्यापक परंपरा है। देवी को शक्ति, प्रकृति, सृजन, संरक्षण और विनाशकारी ऊर्जा के रूप में समझा जाता है। पार्वती, दुर्गा, काली, लक्ष्मी और सरस्वती देवी के विभिन्न रूपों से जुड़ी धार्मिक धारणाएँ हैं, हालांकि सभी को हर भक्त संप्रदाय अलग प्रकार से समझता और उनकी पूजा करता है।
देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती), जो मार्कण्डेय पुराण का एक भाग है, देवी उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें महिषासुरमर्दिनी दुर्गा और अन्य देवी-रूपों की कथाएँ आती हैं।
देवी भागवत पुराण भी शाक्त परंपरा में महत्वपूर्ण है। इसमें देवी को सर्वोच्च शक्ति के रूप में प्रस्तुत करने वाले आख्यान मिलते हैं।
नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा, उपवास, जप, गरबा, दुर्गा पूजा और कन्या पूजन जैसी विभिन्न क्षेत्रीय परंपराएँ प्रचलित हैं।
5\. देवी लक्ष्मी : समृद्धि और मंगल की देवी मानी गई हैं।
लक्ष्मी माता को धन, समृद्धि, सौभाग्य, सौंदर्य और मंगल की देवी के रूप में पूजा जाता है। विष्णु के साथ उनका पत्नी के रूप में संबंध वैष्णव परंपरा में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
विष्णु पुराण और अन्य पौराणिक ग्रंथों में लक्ष्मी माता से जुड़े आख्यान मिलते हैं। समुद्र मंथन की कथा में लक्ष्मी के प्रकट होने का वर्णन मिलता है।
दीपावली पर लक्ष्मी पूजा व्यापक रूप से की जाती है। व्यापारी समुदाय, परिवार और संस्थान अपने कार्यस्थल तथा घरों में समृद्धि और शुभता की कामना उनसे करते हैं।
लक्ष्मी उपासना का व्यापक अर्थ केवल धन प्राप्ति नहीं है। परिवार में संतुलन, उदारता, सदाचार और लोककल्याण को भी समृद्ध जीवन के संदर्भ में समझा जा सकता है।
हिंदू मनीषा में प्रार्थना की जाती है कि अच्छा धन , अच्छे साधनों से खूब आए तथा ,सदैव अच्छे कार्यों में व्यय हो ।
संचय की जगह अच्छे व्यय कि कामना भारतीय संस्कृति की विशेषता है।
6\. सरस्वती : विद्या, वाणी और कला की देवी
सरस्वती ज्ञान, विद्या, संगीत, वाणी और रचनात्मकता की देवी हैं। उन्हें वीणा, पुस्तक, माला और हंस के साथ चित्रित किया जाता है। वसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा विशेष रूप से की जाती है।
सरस्वती का उल्लेख वैदिक साहित्य में नदी और देवी के रूप में मिलता है। बाद की धार्मिक परंपराओं में वे ज्ञान और वाणी की देवी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। देवी भागवत तथा अन्य पौराणिक साहित्य में भी देवी के रूपों का वर्णन मिलता है।
विदेश में रहने वाले भारतीय परिवारों में बच्चों की शिक्षा और कला से सरस्वती पूजा को जोड़ना विशेष अर्थपूर्ण हो सकता है। पुस्तक, संगीत, भाषा और ज्ञान के प्रति सम्मान इस उपासना का सांस्कृतिक विस्तार है।
7\. भगवान गणेश : शुभारंभ और विवेक के देवता
गणेश भगवान को विघ्नहर्ता, गणपति, एकदंत और गजानन जैसे नामों से जाना जाता है। वे शिव और पार्वती के पुत्र के रूप में लोकप्रिय पौराणिक परंपरा में वर्णित हैं। उनका वाहन मूषक माना गया है।
गणेश भगवान की जन्मकथा के विभिन्न संस्करण शिव पुराण, गणेश पुराण और अन्य धार्मिक आख्यानों में मिलते हैं। गणेश पुराण और मुद्गल पुराण गणपति उपासना के महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।
किसी नए कार्य, गृहप्रवेश, विवाह, धार्मिक आयोजन या शिक्षा के आरंभ में गणेश स्मरण की परंपरा प्रचलित है। गणेश चतुर्थी उनका प्रमुख उत्सव है।
गणेश का बड़ा सिर विवेक, बड़े कान सुनने की क्षमता और छोटा मुख कम बोलने के संदेश से , व्याख्या की जाती है। ये प्रतीकात्मक व्याख्याएँ धार्मिक शिक्षण में उपयोगी हैं, हालांकि प्रत्येक प्रतीक का अर्थ सभी प्राचीन ग्रंथों में भिन्न भिन्न समझाया गया है।
8\. राम : मर्यादा, धर्म और आदर्श जीवन के प्रतीक
राम भगवान को विष्णु के अवतार के रूप में माना जाता है। उनके जीवन की प्रमुख कथा महर्षि वाल्मीकि की रामायण में मिलती है। रामचरितमानस, जिसे गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी भाषा में रचा, उत्तर भारत की भक्ति परंपरा में अत्यंत लोकप्रिय है।
राम की कथा में अयोध्या, वनवास, सीता, लक्ष्मण, भरत, हनुमान और लंका से जुड़े प्रसंग आते हैं। राम नवमी को राम जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। दशहरा राम और रावण की कथा से जुड़े उत्सव के रूप में प्रसिद्ध है।
राम के चरित्र को मर्यादा, कर्तव्य, त्याग और धर्म के पालन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर से जोड़कर समझा जाता है। रामायण की विभिन्न भाषाई और क्षेत्रीय परंपराओं में कथा और चरित्रों की व्याख्या अलग-अलग रूपों में मिलती है।
9\. कृष्ण भगवान : लीला, भक्ति और भगवद्गीता
कृष्ण भगवान का परिचय महाभारत, हरिवंश, भागवत पुराण और अन्य वैष्णव ग्रंथों में मिलता है। वे विष्णु के अवतार के रूप में पूजित हैं और अनेक संप्रदायों में सर्वोच्च ईश्वर के रूप में भी आराध्य हैं।
उनके जीवन के प्रमुख प्रसंगों में जन्म, गोकुल और वृंदावन की बाल लीलाएँ, कंस-वध, मथुरा, द्वारका और महाभारत का काल शामिल है। भगवद्गीता में वे अर्जुन को धर्म, कर्म और आत्मा का ज्ञान देते हैं।
कृष्ण जन्माष्टमी उनका प्रमुख उत्सव है। वृंदावन, मथुरा और देश-विदेश के अनेक मंदिरों में जन्माष्टमी पर भजन, कीर्तन, झाँकी और मध्यरात्रि पूजा की जाती है।
कृष्ण की भक्ति परंपरा में वात्सल्य, सख्य, माधुर्य और दास्य जैसे भावों का विकास हुआ है। चैतन्य, वल्लभ, निम्बार्क और अन्य वैष्णव परंपराओं में कृष्ण-भक्ति की विशिष्ट व्याख्याएँ मिलती हैं।
10\. हनुमान भगवान : भक्ति, सेवा और साहस के प्रतीक
हनुमान रामायण के सबसे लोकप्रिय और श्रद्धेय पात्रों में हैं। उन्हें राम के अनन्य भक्त, वीर, बुद्धिमान और सेवाभावी के रूप में स्मरण किया जाता है। उनकी कथा का प्रमुख स्रोत वाल्मीकि रामायण है। हनुमान से जुड़े अनेक आख्यान बाद के पुराणों, लोककथाओं और भक्ति साहित्य में भी मिलते हैं।
हनुमान का चरित्र भक्ति और कर्म के समन्वय का प्रतीक बन गया है। वे केवल शक्ति के देवता नहीं, बल्कि सेवा, विनम्रता और समर्पण के आदर्श भी माने जाते हैं।
हनुमान जयंती की तिथि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग हो सकती है। मंगलवार और शनिवार को हनुमान पूजा की परंपरा अनेक परिवारों में प्रचलित है।
माना जाता है कि भगवान हनुमान जहां भी रामकथा होती है वहां स्वयं उपस्थित रहते हैं।
11\. कार्तिकेय / स्कंद / मुरुगन
कार्तिकेय को स्कंद, कुमार, सुब्रह्मण्य और तमिल परंपरा में मुरुगन के नाम से जाना जाता है। वे शिव और पार्वती के पुत्र के रूप में वर्णित हैं। उनका वाहन मयूर है और वे युद्धकौशल, साहस तथा दिव्य शक्ति से जुड़े हैं।
स्कंद पुराण और महाभारत के कुछ प्रसंगों में स्कंद से संबंधित कथाएँ मिलती हैं। दक्षिण भारत में मुरुगन की उपासना का विशेष महत्व है। तमिलनाडु के मंदिरों और त्योहारों में उनका केंद्रीय स्थान है।
स्कंद षष्ठी तथा थाईपूसम जैसे उत्सव मुरुगन उपासना से जुड़े प्रमुख पर्व हैं।
12\. भगवान सूर्य : प्रकाश और जीवन का आधार हैं
सूर्य देव का उल्लेख ऋग्वेद सहित वैदिक साहित्य में मिलता है। सूर्य प्रकाश, ऊर्जा, समय और जीवन के आधार के रूप में पूजित हैं। सूर्य उपासना की परंपरा वैदिक काल से लेकर आधुनिक भारत तक विभिन्न रूपों में चली आई है।
आदित्य हृदय स्तोत्र रामायण के युद्धकांड में आता है, जहाँ अगस्त्य ऋषि राम को सूर्य की स्तुति का उपदेश देते हैं। सूर्य नमस्कार, अर्घ्यदान और छठ पूजा सूर्य उपासना की विभिन्न परंपराएँ हैं।
रथ सप्तमी और छठ जैसे पर्व सूर्य के प्रति श्रद्धा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता से जुड़े हैं। छठ पूजा की अपनी विशिष्ट लोक और धार्मिक परंपरा है, जिसे विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा प्रवासी भारतीय समुदायों में मनाया जाता है।
13\. विष्णु भगवान के प्रमुख अवतार
अवतार का अर्थ है दिव्य सत्ता का किसी विशिष्ट रूप में धरती पर अवतरण। विष्णु के दशावतार की सूची बहुत प्रसिद्ध है, लेकिन अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में अवतारों की संख्या और क्रम में अंतर मिलता है। भागवत पुराण में अनेक अवतारों का वर्णन है।
1\. मत्स्य अवतार
जलचर रूप में विष्णु का अवतरण। प्रलय और वेदों की रक्षा से संबंधित कथाएँ विभिन्न पुराणों में मिलती हैं।
2\. कूर्म अवतार
समुद्र मंथन के समय मंदार पर्वत को आधार देने वाले कच्छप रूप की कथा।
3\. वराह अवतार
पृथ्वी की रक्षा और हिरण्याक्ष से संबंधित पौराणिक आख्यान।
4\. नरसिंह अवतार
आधे नर और आधे सिंह के रूप में प्रह्लाद की रक्षा और राक्षस हिरण्यकशिपु के वध की कथा।
5\. वामन अवतार
राजा बलि से तीन पग भूमि माँगने और विराट रूप धारण करने का आख्यान।
6\. परशुराम
ऋषि जमदग्नि और रेणुका के पुत्र के रूप में वर्णित। तप, शस्त्रविद्या और धर्म से जुड़े आख्यान।
7\. राम अवतार
अयोध्या के राजकुमार, रामायण के नायक और धर्म-मर्यादा के आदर्श रूप में पूजित हैं।
8\. कृष्ण अवतार
महाभारत, भागवत और भगवद्गीता से संबंधित। भक्ति, ज्ञान और धर्म के उपदेशक। हर स्थिति में समकालीन संसार में मार्ग दिखाते उनके जीवन से हम सदैव प्रेरणा ले सकते हैं।
9\. बुद्ध
कुछ हिंदू पुराणों और दशावतार परंपराओं में बुद्ध को विष्णु का अवतार माना गया है। बौद्ध धर्म की अपनी स्वतंत्र धार्मिक और दार्शनिक परंपरा है।
- कल्कि अवतार
भविष्य में होने वाले विष्णु अवतार के रूप में कल्कि भगवान का वर्णन मिलता है। कल्कि की कथा विशेष रूप से पुराणों में मिलती है। उत्तर प्रदेश में कल्कि भगवान का मंदिर भी है।
दशावतार की यह सूची लोकप्रिय है। विभिन्न परंपराओं में बुद्ध के स्थान पर बलराम या अन्य रूपों का उल्लेख मिलता है।
(गीता प्रेस गोरखपुर विश्वसनीय स्तरीय अव्यवसायिक संस्थान है, जिसका धार्मिक साहित्य अंग्रेजी में भी है। geeta seva app पर भी ऑडियो सहित है। )
(इसे सभी हिंदू संप्रदायों की एकमात्र बाध्यकारी सूची नहीं समझना चाहिए।)

विवेक रंजन श्रीवास्तव
लंदन से