मध्य-पूर्व लंबे समय से संघर्ष, अविश्वास और शक्ति संतुलन की राजनीति का केंद्र रहा है। ईरान और इजऱायल के बीच तनाव केवल दो देशों तक सीमित नहीं, बल्कि इसका असर पूरे क्षेत्र और वैश्विक शांति पर पड़ता है। ऐसे में अमेरिका का साथ ने विश्व उर्जा को भी संकट में डाल दिया है। अब ईरान भी बदले में इजरायल का नुकसान कर रहा है। अब शांति का मार्ग अपनाना चाहिए। युक्रेन- रुस युद्व को ही ले लें वहीं अब कुछ हद कोई समाधान न होने पर शांति बरती जा रही है। इजऱायल से भी है कि वह शांति और संयम का मार्ग अपनाए। इजऱायल ने अपनी सुरक्षा चिंताओं को हमेशा प्राथमिकता दी है, जो उसकी ऐतिहासिक परिस्थितियों और भौगोलिक स्थिति को देखते हुए समझ में आता है। लेकिन लगातार सैन्य कार्रवाई और आक्रामक नीति से स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सकता। यह रणनीति अल्पकालिक सुरक्षा तो दे सकती है, परंतु दीर्घकाल में यह और अधिक अस्थिरता तथा विरोध को जन्म देती है।दूसरी ओर, ईरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं और उसके द्वारा समर्थित समूहों की गतिविधियां भी तनाव को बढ़ाती रही हैं। इसलिए शांति की जिम्मेदारी केवल एक पक्ष पर डालना न्यायसंगत नहीं होगा। दोनों देशों को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।आज की वैश्विक व्यवस्था में युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। संयुक्त राष्ट्र सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार संवाद, कूटनीति और सहयोग पर जोर देता रहा है। यदि दोनों देश अपने मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने की दिशा में कदम बढ़ाएं, तो यह पूरे क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत होगा।इजऱायल को यह समझना होगा कि कठोर सैन्य शक्ति के साथ-साथ कूटनीतिक संतुलन भी आवश्यक है। वहीं ईरान को भी अपने आक्रामक रुख में बदलाव लाना होगा और अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान करना होगा।समय की मांग है कि दोनों देश टकराव की राजनीति से ऊपर उठकर शांति, सह-अस्तित्व और विकास की दिशा में आगे बढ़ें। क्योंकि अंतत: युद्ध में जीत किसी की नहीं होती, बल्कि हार मानवता की होती है। विश्व की महाशक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। अमेरिका ने दशकों तक वैश्विक राजनीति में निर्णायक प्रभाव बनाए रखा है, लेकिन उसकी सैन्य हस्तक्षेप की नीति कई बार शांति के बजाय अस्थिरता को जन्म देती रही है। ऐसे में यह आवश्यक है कि अमेरिका भी शक्ति के प्रदर्शन के बजाय शांति और कूटनीति का मार्ग अपनाए। इराक युद्ध ने जहां क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ाया, वहीं अफगानिस्तान में दो दशक लंबे अभियान के बाद भी स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकी। इससे न केवल स्थानीय जनता को भारी नुकसान हुआ, बल्कि अमेरिका की वैश्विक छवि पर भी सवाल खड़े हुए। बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों में चीन और रूस जैसी शक्तियां भी उभर रही हैं, जो शक्ति संतुलन को नई दिशा दे रही हैं। ऐसे में एकतरफा सैन्य कार्रवाई के बजाय बहुपक्षीय सहयोग और संवाद की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है। शांति का मार्ग अपनाने का अर्थ कमजोरी नहीं, बल्कि दूरदर्शिता और जिम्मेदारी का परिचायक है। यदि अमेरिका कूटनीति, आर्थिक सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से विवादों का समाधान खोजने पर जोर देता है, तो वह न केवल अपने हितों की रक्षा कर सकेगा, बल्कि वैश्विक स्थिरता में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा। आज की दुनिया को युद्ध नहीं, बल्कि संवाद और सह-अस्तित्व की जरूरत है। अमेरिका जैसे शक्तिशाली राष्ट्र को यह समझना होगा कि स्थायी शांति केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विश्वास और सहयोग से स्थापित होती है। यही समय की मांग है कि अमेरिका अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाए और शांति का मार्ग अपनाकर विश्व के लिए एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करे।(आईडब्ल्युएनए)